Dear 'kaddu'...
असल ज़िन्दगी में मैंने जुनून की हद तक पागल इंसान कम ही देखे हैं। 'हैरी पॉटर' के उन विशुद्ध ख़याली चरित्रों के प्रति तुम्हारा लगाव, पागलपन की जीवन्त पराकाष्ठा ही तो है। पर सुख़द है ये पागलपन, क्योंकि ये तुम्हे ले जाता है सबसे परे, हर रोष, हर ग़म, हर हताशा से एकदम इतर... कहीं बड़ी दूर।
तुम्हारे अन्तर्मन में चलते द्वन्द्व को कभी कोई समझ ही नही पाया, इमानदारी से कहें तो तुमने कभी उसे समझने का मौका ही नहीं दिया, न अपने परिवार को और न ही कऱीबियों को। तुम्हारी हताशा,तुम्हारी ख़ुशी, हमेशा तुम्हारी अपनी ही रहीं... एकदम निजी। तुम्हारी सहेलियों में कोई कभी ऐसी हुई ही नहीं जो तुम्हे समझ पायी हो, या जिससे तुम अपना जीवन साझा कर पाई हो। बुनियादी तौर पर कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता है। विगत कुछ वर्षों में शायद एकाध प्रतिशत ही जान पाये हैं तुम्हे। तुम्हे समझना काफी हद तक वैसा ही है जैसे 'जादू की त्रिकोणीय श्रंखला जीतना' ।
पता है हमें उस 'बंद जगह' के लिए तुम कभी बनी ही नहीं थी। तुम तो वो थी जो नवोदय की हज़ार पाबन्दियों के बीच चोरी-छिपे हॉस्टल की सबसे ऊंची वाली छत पे चढ़ के क्षितिज तक फ़ैले उन्मुक्त आकाश को घण्टों निहारने में ही खुशी महसूस करती थी, तुम वो थी जो किसी रोज़ पानी की सबसे ऊँची वाली टंकी में चढ़कर उन्माद से चिल्लाने के ख़्वाब देखती थी, जो चुपचाप आइने के सामने बेतरतीब ढंग से चेहरा बनाती-बिगाड़ती और उसी में खुश हो लिया करती थी , तुम वो थी जो झाड़ू में बैठकर उड़ जाना चाहती थी और तुम वो भी थी जो छोटी लकड़ी को जादुई छड़ी नुमा पकड़ कर एक दिन सबको 'निरस्त्र' कर देना चाहती थी।
पता है 'हैरी पॉटर' की जिस काल्पनिक दुनिया में जीना पसंद है ना तुम्हे, यहां 'JNU' में काफी हद तक वैसी ही दुनिया देखता हूं मैं। Library है यहां पूरे 9 माले की,और हाँ अपना 'हिन्दी सेक्शन' पाँचवे माले पर है। किताबों के बीच अक्सर घूमते हुए देखता हूँ तो दिल्ली, दिल्ली जैसे लगती ही नहीं। चारो ओर हरियाली ही हरियाली है। कहीं दूर किन्तु स्पष्ट दिखाई देती है यहाँ से ऐतिहासिक 'कुतुबमीनार'। बस स्वर्ग की तरह ही लगता है ये नज़ारा। हज़ारो किताबें अटी पड़ी हैं यहाँ। तुम्हे किताबों से विशेष लगाव रहा है न! वास्तव में ये तुम्हारी ही जगह होनी चाहिये थी।
आना कभी यहाँ घूमनें, अच्छा लगेगा! 'PSR' की बेडौल चट्टानों पर गाढ़ी मीठी चाय पीनी हो, या 'साबरमती ढाबा' की स्पेशल 'कचौरी विद छोले', सब खिलाएंगे तुम्हे।
___आख़िर...
_____अमानत होती हैं बहनें!
-Elder Brother
पता है हमें उस 'बंद जगह' के लिए तुम कभी बनी ही नहीं थी। तुम तो वो थी जो नवोदय की हज़ार पाबन्दियों के बीच चोरी-छिपे हॉस्टल की सबसे ऊंची वाली छत पे चढ़ के क्षितिज तक फ़ैले उन्मुक्त आकाश को घण्टों निहारने में ही खुशी महसूस करती थी, तुम वो थी जो किसी रोज़ पानी की सबसे ऊँची वाली टंकी में चढ़कर उन्माद से चिल्लाने के ख़्वाब देखती थी, जो चुपचाप आइने के सामने बेतरतीब ढंग से चेहरा बनाती-बिगाड़ती और उसी में खुश हो लिया करती थी , तुम वो थी जो झाड़ू में बैठकर उड़ जाना चाहती थी और तुम वो भी थी जो छोटी लकड़ी को जादुई छड़ी नुमा पकड़ कर एक दिन सबको 'निरस्त्र' कर देना चाहती थी।
पता है 'हैरी पॉटर' की जिस काल्पनिक दुनिया में जीना पसंद है ना तुम्हे, यहां 'JNU' में काफी हद तक वैसी ही दुनिया देखता हूं मैं। Library है यहां पूरे 9 माले की,और हाँ अपना 'हिन्दी सेक्शन' पाँचवे माले पर है। किताबों के बीच अक्सर घूमते हुए देखता हूँ तो दिल्ली, दिल्ली जैसे लगती ही नहीं। चारो ओर हरियाली ही हरियाली है। कहीं दूर किन्तु स्पष्ट दिखाई देती है यहाँ से ऐतिहासिक 'कुतुबमीनार'। बस स्वर्ग की तरह ही लगता है ये नज़ारा। हज़ारो किताबें अटी पड़ी हैं यहाँ। तुम्हे किताबों से विशेष लगाव रहा है न! वास्तव में ये तुम्हारी ही जगह होनी चाहिये थी।
आना कभी यहाँ घूमनें, अच्छा लगेगा! 'PSR' की बेडौल चट्टानों पर गाढ़ी मीठी चाय पीनी हो, या 'साबरमती ढाबा' की स्पेशल 'कचौरी विद छोले', सब खिलाएंगे तुम्हे।
___आख़िर...
_____अमानत होती हैं बहनें!
-Elder Brother

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