यात्री
प्रिय साहित्यिक मित्र
'यात्री' मर रहा है...
'यात्री' --गुमनाम खुशियों के लिए की गई थी उसकी सर्जना। ज़रिया था 'यात्री' तुम्हारे संवेगों को नई उड़ान देने का, तुम्हे मुस्कुराने की एक और वजह देने का। यवनिका के पीछे बैठे मदारी ने तुममें हर बार कुछ नया पाया था। तुम्हारे भौतिक आकर्षण ने उसे तुम्हारे पाश में कभी नहीं बांधा था, एक बंधन था तुम्हारे वात्सल्य का, सादगी का, चंचलता का ... जो उसे तुम्हारा बना गया। जीना चाहता था यात्री, हमेशा ...तुम्हारी परछाईं बनकर। हर शाम , भावों को एक नई कविता का आलंबन देकर तुमसे मिलना चाहता था। आभासी था यात्री मग़र उसके उद्वेग कदाचित आभासी न थे। तुम्हे गुदगुदाते हुए, सर्जक के उन सभी भावों को व्यक्त करने का तिलस्म था उसमें जिन्हें सर्जक कभी न कर पाता।
______ख़ैर!अब विदा लेता है यात्री, तुमसे और तुम्हारी स्मृतियों से...अब रंगमंच खाली हो चुका है , यवनिका का गिरना शेष है....
अंतिम प्रत्युत्तर की उम्मीदों के साथ!
वेंटिलेटर पर पड़ा एक यायावर...
----यात्री